कुलदेवी
कुलदेवी परिवार और वंश की आराध्य देवी मानी जाती हैं। हिंदू परंपरा में कुलदेवी की पूजा पीढ़ियों से श्रद्धा और विश्वास के साथ की जाती रही है। ऐसा माना जाता है कि कुलदेवी अपने कुल के सदस्यों की रक्षा करती हैं, उन्हें शक्ति प्रदान करती हैं और परिवार में सुख-समृद्धि एवं शांति बनाए रखती हैं। विशेष अवसरों, धार्मिक अनुष्ठानों और पारिवारिक संस्कारों में कुलदेवी का स्मरण एवं पूजन विशेष महत्व रखता है।
कुलदेवी केवल आस्था का प्रतीक ही नहीं, बल्कि परिवार की परंपरा, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कड़ी भी हैं।
पाण्डुका माता मंदिर
पाण्डुका माता का प्रसिद्ध मंदिर राजस्थान के नागौर जिले में मेड़ता के करीब पाण्डरोई गाँव में स्थित है। यह मंदिर मेड़ सिटी से लगभग 6 किलोमीटर पश्चिम और मेड़ता रोड से लगभग किलोमीटर पूर्व की दिशा में है। मंदिर एक प्राकृतिक और शांत वातावरण में बसा हुआ है। मान्यता के अनुसार, पाण्डवों ने अपने वनवास के दौरान यहां तपस्या की थी, जिससे यह क्षेत्र पाण्डुओं का ओरण के नाम से हो गया और माता को पाण्डुका माता के नाम से जाना जाने लगा।
मंदिर के गर्भगृह में तीन प्रमुख प्रतिमाएँ स्थापित हैं। मध्य में महिषासुर-मर्दिनी माता की भव्य प्रतिमा है, बाईं ओर कुन्ती माता विराजमान हैं, और दाईं ओर सिंह पर बैठी दुर्गा माता की संगमरमर की प्रतिमा दिखती है। लेख में मंदिर की प्राचीनता से जुड़े शालेखों का भी उल्लेख है, जिसमें माता की मुख्य प्रतिमा चतुर्भजी एवं महिषासुर-मर्दिनी स्वरूप में दर्शाई गई है। इसके अलावा, मंदिर के सभा-मंडप में दो प्राचीन सिंह प्रतिमाएँ और बाहर गुरु-चेले के रूप में रहने वाले दो भक्तों की समाधियाँ हैं। मंदिर के आसपास कई खंडित प्राचीन मूर्तियाँ भी देखी जा सकती हैं, जिन्हें मंदिर के और संभावित आक्रमणों से जोड़ा गया है।


भेसवामाता (बीजासन माता) मंदिर -सारंगपुर
भैसवामाता (बीजासन माता) मंदिर का संचालन मंदिर ट्रस्ट द्वारा किया जाता है। ट्रस्ट के अंतर्गत 11 शासकीय पदेन सदस्य तथा 16 अशासकीय सदस्य हैं। शासकीय सदस्यों में विधायक, जनपद अध्यक्ष, पंचायत अध्यक्ष एवं सचिव सहित अन्य पदेन सदस्य सम्मिलित हैं। मंदिर ट्रस्ट के प्रबंधक के रूप में कलेक्टर, राजगढ़ की भूमिका रहती है।
मंदिर परिसर में प्रतिवर्ष माघ माह की बसंत पंचमी के अवसर पर एक माह तक विशाल पशु मेला आयोजित किया जाता है। इस मेले में दूर-दूर से श्रद्धालु एवं ग्रामीणजन अपनी आस्था और मन्नतों के साथ माता के दर्शन करने आते हैं। मेले के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति रहती है। पशु मेले से मेला समिति को प्रतिवर्ष उल्लेखनीय आय प्राप्त होती है तथा मंदिर की दान पेटी में भी श्रद्धालुओं द्वारा श्रद्धानुसार दान अर्पित किया जाता है।
माघ मेला एवं पालकी यात्रा
प्रतिवर्ष माघ माह की बसंत पंचमी से पूर्णिमा तक माघ मेले का आयोजन किया जाता है। मेले का समापन पूर्णिमा की रात्रि में विशेष धार्मिक आयोजन के साथ होता है।
समापन अवसर पर माँ भैसवामाता (बीजासन माता) की पालकी यात्रा मुख्य पहाड़ी स्थित मंदिर से प्रारंभ होकर ग्राम भैसवामाता के विभिन्न देवस्थानों से होते हुए पुनः मुख्य मंदिर तक पहुँचती है। इस भव्य नगर भ्रमण में हजारों श्रद्धालु श्रद्धा एवं भक्ति के साथ सम्मिलित होते हैं। पालकी यात्रा के दौरान पूरा क्षेत्र माता के जयकारों और भक्तिमय वातावरण से गुंजायमान हो उठता है।
यह मेला एवं पालकी यात्रा स्थानीय धार्मिक परंपरा, आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु सम्मिलित होकर माँ भैसवामाता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
