top of page
खोज करे

पंचमी पर मां स्कंदमाता की कथा, पूजा और कृपा का महत्व

1 दिन पहले
8 मिनट पठन

नवरात्रि का पांचवां दिन भक्ति को एक गहरी मातृ-भावना से जोड़ता है। इस दिन मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है। पंचमी की साधना हमें याद दिलाती है कि शक्ति केवल युद्ध और विजय का नाम नहीं है, वह पालन, करुणा, धैर्य और संरक्षण का भी रूप है।


मां स्कंदमाता को भगवान कार्तिकेय, जिन्हें स्कंद भी कहा जाता है, की माता माना जाता है। उनकी गोद में विराजमान बाल स्कंद यह संदेश देते हैं कि दिव्यता की सबसे कोमल अभिव्यक्ति मां की गोद में दिखती है। सिंह पर सवार, कमल पर आसन धारण करने वाली और वात्सल्य से भरी यह देवी भक्तों को भय से मुक्त करती हैं और जीवन में संतुलन, विवेक और शांति की प्रेरणा देती हैं।


Wide-angle view of मां स्कंदमाता की प्रतीकात्मक मूर्ति मंदिर के शांत गर्भगृह में विराजमान है
मां स्कंदमाता का स्वरूप मातृ प्रेम और शक्ति का संगम दिखाता है।

मां स्कंदमाता कौन हैं


मां स्कंदमाता नवदुर्गा का पांचवां स्वरूप हैं। उनके नाम में ही उनका परिचय छिपा है। स्कंद की माता, यानी भगवान कार्तिकेय की जननी। कार्तिकेय को स्कंद, कुमार, मुरुगन और सुब्रह्मण्य जैसे नामों से भी जाना जाता है। दक्षिण भारत में उन्हें विशेष रूप से पूजनीय माना जाता है, जबकि उत्तर भारत में नवरात्रि के दौरान मां स्कंदमाता के रूप में उनकी माता की पूजा होती है।


देवी के पारंपरिक स्वरूप में उन्हें चार भुजाओं वाली माना जाता है। दो हाथों में कमल, एक हाथ में बाल स्कंद और एक हाथ भक्तों के लिए वरद मुद्रा में रहता है। उनका वाहन सिंह है। कई वर्णनों में वे कमलासन पर विराजमान बताई जाती हैं, इसलिए उन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है।


उनका स्वरूप एक साथ तीन भाव देता है।


  • मातृत्व

    वे अपनी गोद में बाल स्कंद को धारण करती हैं। यह वात्सल्य, सुरक्षा और पोषण का प्रतीक है।


  • शक्ति

    सिंह उनका वाहन है। यह साहस, आत्मविश्वास और धर्म की रक्षा का संकेत देता है।


  • शांति

    कमल उनके हाथों में और आसन में दिखाई देता है। कमल संसार में रहते हुए भी पवित्र रहने की प्रेरणा देता है।


मां स्कंदमाता की उपासना यह समझाती है कि जीवन में शक्ति तभी पूर्ण होती है, जब उसमें करुणा जुड़ी हो। केवल बल से व्यवस्था नहीं बनती, प्रेम और धैर्य भी उतने ही आवश्यक हैं।


पंचमी का दिन मां स्कंदमाता को क्यों समर्पित है


नवरात्रि के पहले चार दिन साधक धीरे-धीरे अपने भीतर की ऊर्जा को स्थिर करता है। शैलपुत्री से आरंभ होकर ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा और कूष्मांडा तक देवी के रूप जीवन में आधार, तप, साहस और सृजन की प्रेरणा देते हैं। पांचवें दिन यह साधना करुणा और संरक्षण के भाव तक पहुंचती है।


पंचमी पर मां स्कंदमाता की पूजा व्यक्ति को यह अनुभव कराती है कि मां की कृपा केवल बाहरी संकटों से बचाने तक सीमित नहीं है। वह मन में उठने वाले भय, भ्रम, क्रोध और असुरक्षा को भी शांत करती है।


आध्यात्मिक परंपराओं में यह दिन मन की शुद्धि और वाणी की पवित्रता से भी जोड़ा जाता है। कुछ साधना पद्धतियों में पांचवें दिन ध्यान का संबंध विशुद्धि चक्र से माना जाता है। यह चक्र अभिव्यक्ति, सत्य और भीतर की स्पष्टता से जुड़ा है। इस दृष्टि से मां स्कंदमाता की पूजा भक्त को संयमित बोल, शांत मन और सात्विक विचारों की ओर ले जाती है।


यहां पंचमी पर मां स्कंदमाता की कथा केवल पौराणिक आख्यान नहीं है, बल्कि जीवन में करुणा और साहस के संतुलन को समझने का माध्यम भी है।


Close-up view of कमल, दीपक और पूजा सामग्री मां स्कंदमाता की पूजा के लिए सजी हुई है
पंचमी की पूजा में सरलता, श्रद्धा और पवित्र भाव सबसे अधिक महत्त्व रखते हैं।

भगवान कार्तिकेय की माता के रूप में मां की कथा


मां स्कंदमाता से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा भगवान कार्तिकेय के जन्म और तारकासुर वध से संबंधित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार तारकासुर नामक असुर ने कठिन तप किया और वरदान पाया। उसे ऐसा वर मिला कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र द्वारा हो सकता था। उस समय भगवान शिव तप में लीन थे, इसलिए देवताओं को चिंता हुई कि तारकासुर का अंत कैसे होगा।


देवताओं की प्रार्थना और ब्रह्मांडीय व्यवस्था के अनुसार शिव और पार्वती का विवाह हुआ। बाद में उनके तेज से एक दिव्य बालक का जन्म हुआ। यही बालक स्कंद या कार्तिकेय कहलाए। कथा के अलग-अलग रूपों में उनके पालन-पोषण से जुड़ी बातें अलग मिलती हैं। कहीं उन्हें कृतिका नक्षत्रों से जुड़ी मातृ शक्तियों ने पाला, इसलिए उनका नाम कार्तिकेय पड़ा। कहीं वे शिव-पार्वती के पुत्र और देवताओं के सेनापति के रूप में वर्णित हैं।


जब कार्तिकेय बड़े हुए, तो उन्होंने देवताओं की सेना का नेतृत्व किया और तारकासुर का वध किया। इस विजय में उनकी वीरता दिखाई देती है, पर उसके पीछे मां पार्वती का मातृत्व भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। मां ने केवल एक योद्धा को जन्म नहीं दिया, उन्होंने धर्म की रक्षा करने वाली चेतना को पोषित किया।


मां स्कंदमाता का यही भाव भक्तों को स्पर्श करता है। वे अपने पुत्र को गोद में लेकर भी सिंह पर सवार हैं। यह चित्र बताता है कि मां का प्रेम कमजोर नहीं होता। वह रक्षा करता है, दिशा देता है और आवश्यक होने पर अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना भी सिखाता है।


मां स्कंदमाता की करुणा कैसी मानी जाती है


मां स्कंदमाता की करुणा को निस्सीम मातृ करुणा कहा जा सकता है। भक्त चाहे किसी भी अवस्था में हो, मां की शरण में उसे अपनापन मिलता है। नवरात्रि की पूजा में यह भाव बहुत महत्त्व रखता है, क्योंकि साधक हर दिन देवी के एक नए रूप से जुड़ता है। पांचवें दिन वह मां की गोद जैसे सुरक्षित भाव में प्रवेश करता है।


उनकी करुणा को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है।


वे भय को शांत करती हैं


जीवन में कई बार भय बाहरी परिस्थितियों से नहीं, भीतर की आशंकाओं से पैदा होता है। मां स्कंदमाता की पूजा में ध्यान, मंत्र और आरती मन को स्थिर करते हैं। जब मन स्थिर होता है, तो संकट को देखने का दृष्टिकोण बदलता है।


वे संबंधों में कोमलता लाती हैं


मां के स्वरूप में बाल स्कंद का होना परिवार, स्नेह और जिम्मेदारी का संकेत है। इस दिन की साधना से भक्त अपने व्यवहार में धैर्य और संवेदना लाने का संकल्प कर सकता है। घर में बुजुर्गों, बच्चों और परिवार के सदस्यों के प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार भी देवी पूजा का ही विस्तार है।


वे सफलता को धर्म से जोड़ती हैं


कार्तिकेय विजय के देवता माने जाते हैं, पर उनकी विजय धर्म के लिए थी। मां स्कंदमाता की कृपा से मिली शक्ति का अर्थ केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं है। उसका अर्थ है सही मार्ग पर आगे बढ़ना, अपने कर्म में ईमानदार रहना और दूसरों के हित का ध्यान रखना।


Eye-level view of मां स्कंदमाता का स्नेहमय चित्र भक्तों के बीच पूजा स्थान पर रखा है
मां की गोद में बाल स्कंद भक्तों को सुरक्षा और अपनापन का भाव देते हैं।

पंचमी पर पूजा विधि और सामान्य अनुष्ठान


पंचमी की पूजा में भव्यता से अधिक भाव की आवश्यकता होती है। घर में साधारण पूजा भी श्रद्धा से की जाए, तो उसका आध्यात्मिक प्रभाव गहरा माना जाता है। नवरात्रि में जिन घरों में घटस्थापना होती है, वहां पांचवें दिन भी नियमित दीप, नैवेद्य और पाठ जारी रहता है।


सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा स्थान को साफ किया जाता है। मां दुर्गा या मां स्कंदमाता के चित्र या प्रतिमा के सामने दीप जलाया जाता है। फिर जल, अक्षत, रोली, चंदन, पुष्प और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं।


मां स्कंदमाता को कमल विशेष प्रिय माना जाता है। कमल उपलब्ध न हो, तो साफ और सुगंधित फूल अर्पित किए जा सकते हैं। कई घरों में इस दिन केले का भोग लगाया जाता है। पीले या सफेद रंग के वस्त्र और फूल भी शुभ माने जाते हैं।


पूजा में यह सरल मंत्र जपा जा सकता है।


ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः

मंत्र जप के बाद दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती के अंश, देवी कवच या अपनी परंपरा के अनुसार पाठ किया जा सकता है। अंत में आरती करें और प्रसाद बांटें।


पंचमी की पूजा में ये संकल्प विशेष रूप से रखे जा सकते हैं।


  • वाणी में कटुता कम करने का संकल्प

  • घर में शांति और आपसी सम्मान बनाए रखने का संकल्प

  • बच्चों और जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशील रहने का संकल्प

  • अपने कर्म को धर्म और ईमानदारी से जोड़ने का संकल्प


कुछ परिवार नवरात्रि के हर दिन कन्याओं का सम्मान करते हैं, जबकि कई जगह अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन होता है। पंचमी पर भी बालिकाओं, बच्चों और मातृ स्वरूप महिलाओं के प्रति आदर का भाव रखना मां स्कंदमाता की उपासना से जुड़ा सुंदर अभ्यास है।


व्रत और भोग का महत्व


नवरात्रि व्रत का उद्देश्य केवल भोजन का नियम नहीं है। इसका मूल भाव है इंद्रियों पर संयम और मन को सात्विक बनाना। पंचमी पर व्रत रखने वाले भक्त फलाहार, सात्विक भोजन या अपने परिवार की परंपरा के अनुसार आहार लेते हैं।


भोग में केला, दूध से बने प्रसाद, मिश्री, पंचामृत या फल चढ़ाए जाते हैं। कुछ क्षेत्रों में सूखे मेवे और हल्का मीठा प्रसाद भी अर्पित किया जाता है। यहां नियम से अधिक महत्त्व शुद्धता और भाव का है।


व्रत के दौरान क्रोध, चुगली, अपशब्द और अनावश्यक विवाद से बचना भी पूजा का हिस्सा माना गया है। अगर दिनभर मन अशांत रहे और केवल भोजन बदला जाए, तो साधना अधूरी रह जाती है। मां स्कंदमाता की पूजा मन को मातृत्व की कोमलता से भरने का अवसर है।


मां स्कंदमाता की कृपा का आध्यात्मिक अर्थ


मां स्कंदमाता का आशीर्वाद भक्त को केवल बाहरी उपलब्धि नहीं देता, वह भीतर की परिपक्वता की ओर भी ले जाता है। उनका स्वरूप सिखाता है कि सच्ची शक्ति में करुणा रहती है और सच्चे प्रेम में साहस।


जब भक्त मां की गोद में बैठे बाल स्कंद को देखता है, तो उसे अपने भीतर के बाल भाव की भी याद आती है। यह वह हिस्सा है जो सुरक्षा चाहता है, प्रेम चाहता है और भरोसा चाहता है। मां की पूजा उस भरोसे को जगाती है कि जीवन की कठिन राहों में भी दिव्य संरक्षण साथ है।


उनका सिंह बताता है कि भय से भागना नहीं है। कमल बताता है कि संसार में रहते हुए भी मन की पवित्रता बचाई जा सकती है। उनका वरद हाथ बताता है कि विनम्रता से मांगी गई कृपा कभी व्यर्थ नहीं जाती।


आध्यात्मिक रूप से मां स्कंदमाता की साधना इन गुणों को पोषित करती है।


  • धैर्य

  • विवेक

  • शांत वाणी

  • मातृभाव

  • आत्मविश्वास

  • धर्म के प्रति निष्ठा


पंचमी के दिन की पूजा इसलिए विशेष है, क्योंकि यह साधक को क्रिया से भावना तक ले जाती है। दीप जलाना, फूल चढ़ाना और मंत्र जपना बाहरी कर्म हैं। पर इनके भीतर लक्ष्य है मन को ऐसा बनाना, जिसमें करुणा और साहस साथ रह सकें।


Top-down view of दीपक और प्रसाद से सजी पंचमी पूजा की वेदी शांत वातावरण में रखी है
पंचमी की साधना जीवन में शांति, साहस और करुणा का भाव जगाती है।

जीवन में मां स्कंदमाता के संदेश को कैसे अपनाएं


देवी पूजा का प्रभाव तभी गहरा होता है, जब उसका संदेश दैनिक जीवन में उतरे। मां स्कंदमाता की पूजा के बाद कुछ छोटे अभ्यास जीवन को अधिक सात्विक बना सकते हैं।


घर में किसी एक व्यक्ति से प्रेमपूर्वक बात करें, जिससे मनमुटाव हो। बच्चों के साथ धैर्य रखें। माता-पिता या बुजुर्गों का हाल पूछें। अपने शब्दों पर ध्यान दें। जहां क्रोध करना आसान हो, वहां थोड़ी देर मौन रखें। किसी जरूरतमंद को भोजन, फल या आवश्यक वस्तु दें।


ये सब पूजा के बाद के कर्म हैं, पर इन्हीं से पूजा जीवंत होती है। मां स्कंदमाता का मातृभाव मंदिर तक सीमित नहीं रहता। वह घर, व्यवहार, निर्णय और संबंधों में उतर सकता है।


पंचमी पर मां स्कंदमाता की साधना हमें यह याद दिलाती है कि जीवन की सबसे बड़ी शक्ति करुणा से जन्म लेती है। मां की गोद में बैठा बाल स्कंद भविष्य की विजय का प्रतीक है, और सिंह पर विराजमान मां उस विजय को धर्म, सुरक्षा और प्रेम से जोड़ती हैं।


नवरात्रि के पांचवें दिन यदि मन सच्ची श्रद्धा से मां को पुकारे, तो पूजा केवल अनुष्ठान नहीं रहती। वह भीतर एक शांत विश्वास बन जाती है। यही विश्वास भक्त को कठिन समय में संभालता है और अच्छे समय में विनम्र बनाए रखता है। मां स्कंदमाता की कृपा से जीवन में साहस आए, वाणी में मधुरता आए और हृदय में वह करुणा जागे, जो हर संबंध को पवित्र बना देती है।


 
 
 

टिप्पणियां


  • Whatsapp
  • Youtube
  • Instagram
  • Facebook

Terms & Conditions

Privacy Policy

Accessibility Statement

©2026 by RAJGARH KUDKYA ACHARYA GOUTRA PARIVAR EKTA SAMITI

bottom of page