परिवर्तिनी एकादशी 2026 परिवार संग व्रत का महत्व और एक साथ उपवास की प्रेरणा
घर में जब कोई एक सदस्य व्रत रखता है, तो वह उसकी निजी साधना बनती है। लेकिन जब पूरा परिवार मिलकर एकादशी का संकल्प लेता है, तो वही दिन घर के वातावरण को बदल देता है। रसोई से लेकर पूजा स्थान तक, बातचीत से लेकर भोजन तक, सबमें एक शांत, सात्त्विक और जुड़ा हुआ भाव आने लगता है।
पार्श्व एकादशी, जिसे परिवर्तिनी एकादशी भी कहा जाता है, वर्ष 2026 में 22 सितंबर, मंगलवार को मानी जाएगी। यह भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी होती है और चातुर्मास के बीच आती है। परंपरा में इसे भगवान विष्णु की विशेष भक्ति, संयम और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन से जोड़ा गया है।
परिवार के साथ यह व्रत करने की प्रेरणा केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है। यह एक दिन है जब बच्चे भक्ति सीखते हैं, बड़े आत्मसंयम का अभ्यास करते हैं, बुजुर्ग अपने अनुभव बांटते हैं और घर में बैठकर मिलकर भगवान का नाम लिया जाता है।

पार्श्व एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी क्यों कहा जाता है
भाद्रपद शुक्ल एकादशी को कई नामों से जाना जाता है। इसे पार्श्व एकादशी, परिवर्तिनी एकादशी, जलझूलनी एकादशी और कुछ क्षेत्रों में वामन एकादशी भी कहा जाता है। नाम अलग हो सकते हैं, लेकिन भाव एक ही है, भगवान विष्णु की भक्ति और मन के भीतर अच्छे परिवर्तन का संकल्प।
परंपरागत मान्यता के अनुसार चातुर्मास में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं। इस एकादशी पर उनके करवट बदलने का भाव माना जाता है, इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। यह प्रतीक बहुत सुंदर है। जैसे भगवान करवट बदलते हैं, वैसे ही भक्त भी अपने जीवन में एक शुभ मोड़ ले सकता है।
यह परिवर्तन बड़ा न भी हो, तो भी अच्छा है। जैसे:
क्रोध कम करना
भोजन में सात्त्विकता लाना
परिवार में मीठा बोलना
नियमित प्रार्थना की आदत बनाना
दूसरों की सहायता करना
अनावश्यक खर्च और दिखावे से बचना
व्रत का असली अर्थ केवल भोजन छोड़ना नहीं है। व्रत का अर्थ है किसी शुभ नियम को पकड़ना। जब परिवार साथ मिलकर नियम पकड़ता है, तो वह नियम बोझ नहीं लगता, वह उत्सव बन जाता है।
परिवार संग व्रत रखने का महत्व
परिवार में हर व्यक्ति की दिनचर्या अलग होती है। किसी को स्कूल जाना होता है, किसी को काम पर जाना होता है, किसी को घर संभालना होता है। ऐसे में एक दिन साझा व्रत रखना परिवार को फिर से एक धागे में बांध सकता है।
एकादशी का व्रत घर में तीन स्तरों पर असर डालता है।
घर का वातावरण सात्त्विक होता है
व्रत वाले दिन घर में हल्का भोजन, पूजा, भजन, कथा और शांत बातचीत का माहौल बनता है। रसोई में भी सात्त्विक चीजें बनती हैं। फल, दूध, मखाना, साबूदाना, सिंघाड़े का आटा, कुट्टू, आलू और मूंगफली जैसी चीजें कई घरों में व्रत के अनुसार उपयोग की जाती हैं। परिवार अपनी परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार निर्णय ले सकता है।
जब घर का भोजन सात्त्विक होता है, तो बातचीत भी धीरे-धीरे सात्त्विक होने लगती है। यह एक दिन की साधना आगे कई दिनों तक मन पर असर छोड़ सकती है।
बच्चों को धर्म संस्कार के रूप में मिलता है
बच्चे उपदेश से कम और वातावरण से अधिक सीखते हैं। यदि वे देखते हैं कि घर के बड़े लोग प्रेम से व्रत कर रहे हैं, पूजा में बैठ रहे हैं, कथा सुन रहे हैं और जरूरतमंदों को कुछ दे रहे हैं, तो उनके मन में धर्म डर नहीं, अपनापन बनकर आता है।
बच्चों को कठोर उपवास करवाने की जरूरत नहीं। उन्हें उम्र के अनुसार छोटी भूमिका दी जा सकती है।
वे पूजा में फूल रख सकते हैं
तुलसी को जल चढ़ा सकते हैं
भगवान विष्णु का नाम बोल सकते हैं
दादी या नानी से कथा सुन सकते हैं
फलाहार में मदद कर सकते हैं
शाम को भजन में ताली बजा सकते हैं
इस तरह व्रत उनके लिए दबाव नहीं, परिवार के साथ बिताया गया पवित्र दिन बनता है।
परिवार में अनुशासन और करुणा दोनों बढ़ते हैं
व्रत का अर्थ यह नहीं कि घर में चिड़चिड़ापन बढ़ जाए या किसी पर नियम थोपे जाएं। सच्चा व्रत अनुशासन के साथ करुणा भी सिखाता है। यदि किसी सदस्य को दवा लेनी है, स्वास्थ्य कारणों से भोजन करना है या कठिन कार्य करना है, तो उसके लिए सरल नियम रखे जा सकते हैं।
एक परिवार में व्रत तभी सफल होता है जब सभी एक-दूसरे की स्थिति समझें। कोई निर्जल व्रत रखे, कोई फलाहार करे, कोई केवल सात्त्विक भोजन लेकर भगवान का नाम ले, सभी की भावना का सम्मान होना चाहिए।

22 सितंबर 2026 के लिए परिवार का सरल व्रत संकल्प
परिवर्तिनी एकादशी 2026 मंगलवार, 22 सितंबर को है। तिथि और पारण का समय स्थान के अनुसार बदल सकता है, इसलिए अपने स्थानीय पंचांग या परिवार के पुरोहित से समय अवश्य मिलाएं। फिर भी परिवार पहले से तैयारी कर ले, तो व्रत का दिन शांत और व्यवस्थित बीतता है।
एक दिन पहले तैयारी करें
व्रत की तैयारी दशमी से शुरू हो जाती है। रात को भारी, तामसिक और बहुत मसालेदार भोजन से बचना अच्छा माना जाता है। घर की पूजा जगह साफ कर लें। भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, तुलसी जी और वामन भगवान की पूजा सामग्री रख लें।
घर में जो लोग व्रत रखेंगे, वे पहले ही तय कर लें कि वे किस प्रकार का व्रत करेंगे।
निर्जल व्रत
जल के साथ उपवास
फलाहार
दूध और फल
केवल सात्त्विक भोजन
स्वास्थ्य सबसे पहले है। गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग, बच्चे, मधुमेह या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं वाले लोग डॉक्टर की सलाह और अपनी स्थिति के अनुसार ही व्रत रखें।
सुबह का संकल्प सरल रखें
सुबह स्नान के बाद पूजा स्थान पर बैठें। दीप जलाएं। भगवान विष्णु को पीले फूल, तुलसी दल, फल और जल अर्पित करें। परिवार के सभी सदस्य मिलकर छोटा संकल्प ले सकते हैं।
संकल्प कुछ इस भाव में हो सकता है:
हे भगवान विष्णु, आज हम परिवार सहित एकादशी व्रत का पालन करने का प्रयास करते हैं। हमारे मन, वचन और कर्म को शुद्ध करें। घर में प्रेम, धैर्य और भक्ति बनी रहे।
संकल्प बड़ा या कठिन होना जरूरी नहीं। भाव सच्चा होना चाहिए।
दिनभर भक्ति और संयम रखें
एकादशी के दिन केवल खाना न छोड़ें, कुछ आदतें भी थोड़ी देर के लिए छोड़ें। अनावश्यक बहस, कटु वचन, क्रोध, चुगली और बहुत अधिक स्क्रीन समय से बचने का प्रयास करें।
परिवार साथ मिलकर ये काम कर सकता है:
विष्णु सहस्रनाम या भगवान विष्णु के नामों का पाठ
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप
एकादशी कथा का श्रवण
तुलसी पूजा
शाम को दीपदान
जरूरतमंद को भोजन, फल या वस्त्र दान
घर के बुजुर्गों का आशीर्वाद
यदि सभी व्यस्त हैं, तो शाम का एक समय निश्चित करें। आधा घंटा भी पूरे मन से दिया जाए, तो वह परिवार के लिए यादगार बन सकता है।
व्रत को बोझ नहीं, उत्सव बनाएं
कई बार व्रत का नाम सुनते ही घर में चिंता शुरू हो जाती है। क्या खाएंगे, कौन बनाएगा, बच्चे कैसे रहेंगे, काम कैसे होगा। यदि थोड़ी योजना बना ली जाए, तो व्रत सहज हो जाता है।
फलाहार को सरल रखें
व्रत के नाम पर बहुत तला-भुना और भारी भोजन बना लेने से उपवास का भाव कमजोर हो सकता है। सरल फलाहार अधिक अच्छा रहता है। जैसे फल, दूध, दही, मखाना, नारियल पानी, भुना हुआ मूंगफली दाना या हल्का साबूदाना। हर घर की परंपरा अलग होती है, इसलिए अपनी परंपरा के अनुसार चलें।
साधारण नियम यह हो सकता है कि भोजन हल्का हो, मन शांत रहे और पूजा में आलस्य न आए।
जिम्मेदारी बांट दें
एक व्यक्ति ही पूरी पूजा, रसोई और व्यवस्था संभाले, तो थकान बढ़ सकती है। परिवार में छोटे-छोटे काम बांट दें।
कोई पूजा सामग्री सजाए
कोई फल धोकर रखे
कोई कथा पढ़े
कोई भजन लगाए
कोई बुजुर्गों को बैठने में मदद करे
बच्चे प्रसाद बांटें
जब जिम्मेदारी बांटती है, तो व्रत में सहभागिता बढ़ती है। यही परिवार संग व्रत का असली आनंद है।

एकादशी व्रत में कथा और संवाद का स्थान
परिवर्तिनी एकादशी को केवल पूजा विधि तक सीमित न रखें। इसे परिवार के संवाद का दिन भी बनाएं। रात में या शाम को सभी बैठकर एक छोटी चर्चा कर सकते हैं।
कुछ प्रश्न बहुत उपयोगी हो सकते हैं:
इस महीने हम घर में कौन सी अच्छी आदत शुरू कर सकते हैं?
हम किस बात पर कम क्रोधित होंगे?
किसकी मदद कर सकते हैं?
घर में रोज पांच मिनट प्रार्थना कैसे शुरू करें?
बच्चों को कौन सी अच्छी कथा सुनाई जाए?
धर्म केवल मंदिर या पूजा स्थान में नहीं रहता। वह भोजन की थाली, बोलचाल, व्यवहार और निर्णयों में भी उतरता है। एकादशी ऐसे ही छोटे बदलावों का अवसर देती है।
पार्श्व एकादशी का “परिवर्तन” वाला भाव यहां सबसे अधिक काम आता है। हर सदस्य अपने भीतर कोई एक सुधार चुन सकता है। कोई मीठा बोलने का संकल्प ले, कोई देर रात तक मोबाइल न देखने का, कोई रोज तुलसी को जल देने का, कोई सप्ताह में एक दिन दान करने का। छोटे संकल्प लंबे समय तक टिकते हैं।
बुजुर्गों और बच्चों के लिए व्रत में प्रेम जरूरी है
घर में व्रत के समय सबसे अधिक ध्यान उन लोगों का रखना चाहिए जिन्हें शारीरिक सहायता की जरूरत हो सकती है। बुजुर्गों को समय पर दवा चाहिए हो सकती है। बच्चों को भूख जल्दी लग सकती है। किसी को काम पर जाना हो सकता है। ऐसे में नियमों को भावना के साथ निभाएं, कठोरता के साथ नहीं।
यदि कोई पूर्ण उपवास नहीं रख पा रहा, तो उसे अपराधबोध न दें। वह भी इस तरह जुड़ सकता है:
भगवान विष्णु का नाम जपकर
सात्त्विक भोजन लेकर
शाम की आरती में बैठकर
दान या सेवा करके
मन में क्षमा और विनम्रता रखकर
व्रत का मूल्य भूखे रहने की मात्रा से नहीं, भावना की ईमानदारी से बढ़ता है। परिवार यदि यह बात समझ ले, तो व्रत सबके लिए सुखद बन जाता है।
द्वादशी पारण को भी उतना ही महत्व दें
एकादशी व्रत का समापन द्वादशी को पारण से होता है। पारण का समय स्थानीय पंचांग से देखकर करना चाहिए। पारण में जल्दबाजी या अत्यधिक भारी भोजन से बचें। भगवान को भोग लगाकर, तुलसी का सम्मान करके, शांत मन से व्रत खोलना शुभ माना जाता है।
परिवार इसमें भी साथ रहे। व्रत खोलते समय ईश्वर को धन्यवाद दें कि एक दिन संयम, भक्ति और प्रेम से बिताने का अवसर मिला। यदि संभव हो, तो पारण के दिन किसी जरूरतमंद को भोजन या अन्न दान करें।

परिवार संग व्रत की सबसे बड़ी प्रेरणा
22 सितंबर 2026 को आने वाली पार्श्व एकादशी केवल पंचांग की तारीख नहीं है। यह घर में भक्ति का एक साझा अवसर है। इस दिन परिवार एक साथ बैठ सकता है, भगवान विष्णु का स्मरण कर सकता है, भोजन में सादगी ला सकता है और मन में एक छोटा सकारात्मक परिवर्तन चुन सकता है।
हर सदस्य का व्रत एक जैसा हो, यह जरूरी नहीं। किसी का उपवास कठोर होगा, किसी का सरल। कोई फलाहार करेगा, कोई केवल पूजा में बैठेगा। फिर भी यदि भाव एक है, तो परिवार की साधना एक है।
इस परिवर्तिनी एकादशी पर घर में यह संकल्प लिया जा सकता है कि व्रत केवल एक दिन का नियम नहीं रहेगा। इससे एक अच्छी आदत जन्म लेगी। रोज कुछ मिनट प्रार्थना, सप्ताह में एक बार सात्त्विक भोजन, महीने में एक बार दान, और परिवार में थोड़ा अधिक धैर्य।
यही व्रत की सच्ची प्रेरणा है। भगवान के पास जाने का रास्ता घर के भीतर से भी गुजरता है। जब परिवार साथ चलता है, तो वह रास्ता आसान, सुंदर और अधिक पवित्र हो जाता है।
दिनांक एवं समय (2026)
एकादशी तिथि प्रारंभ: 21 सितंबर 2026, रात्रि 8:00 बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 22 सितंबर 2026, रात्रि 9:43 बजे
व्रत पारणा का समय: 23 सितंबर 2026, प्रातः 5:38 बजे से 8:03 बजे तक




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